अदनान आलम

लंदन: ब्रिटेन से सामने आई एक ताज़ा रिपोर्ट ने बेटियों के प्रति सामाजिक सोच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आंकड़ों के अनुसार, यूके में हर साल 1.10 लाख से अधिक गर्भपात किए जा रहे हैं। इनमें से कई मामलों में गर्भपात का कारण भ्रूण का लिंग बताया जा रहा है, जो ब्रिटिश कानून और सरकारी दिशा-निर्देशों के खिलाफ है।

British Pregnancy Advisory Service (BPAS), जो ब्रिटेन की सबसे बड़ी abortion service provider है, देश के लगभग आधे गर्भपात कराती है। हालिया रिपोर्ट्स में आरोप लगे हैं कि संस्था ने sex-selective abortion को लेकर अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया है। खास तौर पर British Indian community में यह प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ती हुई दिखाई दे रही है, जहां बेटी होने की जानकारी मिलने के बाद गर्भपात कराया जा रहा है।

UK सरकार के दिशा-निर्देश साफ तौर पर कहते हैं कि “gender alone cannot be a legal ground for abortion”, यानी केवल भ्रूण के लिंग के आधार पर गर्भपात कानूनी नहीं है।

डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ एंड सोशल केयर (DHSC) की 2017 से 2021 के बीच की स्टडी में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। भारतीय मूल के परिवारों में तीसरे या उससे बाद में जन्म लेने वाले बच्चों में लड़कों और लड़कियों का अनुपात 113:100 दर्ज किया गया, जबकि सामान्य अनुपात 105:100 माना जाता है।

15,401 जन्मों पर आधारित इस अध्ययन के अनुसार, अनुमान है कि इन पांच वर्षों में करीब 400 बच्चियां sex-selective abortion के कारण जन्म ही नहीं ले सकीं। रिपोर्ट में इस अंतर को “statistically significant” बताया गया है।

ब्रिटेन के Abortion Act में भ्रूण के लिंग को गर्भपात का कारण नहीं माना गया है। हालांकि BPAS की वेबसाइट पर यह कहा गया कि कानून इस मुद्दे पर ‘silent’ है, जिसके बाद विवाद गहरा गया। आलोचकों का कहना है कि इसी अस्पष्टता की वजह से महिलाओं पर सामाजिक और पारिवारिक दबाव बढ़ता है और गर्भपात को ‘कानूनी’ बताकर जायज़ ठहराया जाता है।

Right To Life जैसे प्रो-लाइफ संगठनों ने BPAS पर गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। फोर्स्ड मैरिज और ऑनर-बेस्ड वायलेंस के खिलाफ काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता Dame Jasvinder Sanghera ने कहा है कि sex-selective abortions हो रहे हैं और इसे नकारा नहीं जा सकता।

उनका कहना है कि दहेज और पारंपरिक सोच के चलते आज भी बेटियों को आर्थिक बोझ माना जाता है। हेल्थ प्रोफेशनल्स को ‘cultural sensitivity’ या ‘racism’ के डर से इस सच्चाई से आंखें नहीं मूंदनी चाहिए।

भारत में भ्रूण लिंग जांच रोकने के लिए PNDT Act जैसे सख्त कानून लागू हैं, फिर भी यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी। अब वही मानसिकता ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में भी दिखाई दे रही है। यह रिपोर्ट बताती है कि समस्या किसी एक देश या कानून की नहीं, बल्कि सोच की है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बेटियां भारत में हों या विदेश में, उन्हें गर्भ में ही खत्म करने की सोच एक जैसी है। फर्क बस इतना है कि कहीं यह खुलकर सामने आती है और कहीं आंकड़ों में छिप जाती है। असली सवाल कानून से आगे जाकर सामाजिक सोच पर टिका है क्या समाज बेटियों को स्वीकार करने के लिए तैयार है?

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