अदनान आलम

पटना: जैसे-जैसे खरमास समाप्त होने का दिन नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव की सुगबुगाहट तेज होती जा रही है। राजधानी पटना स्थित जनता दल (यूनाइटेड) के मुख्यालय के बाहर लगे दो नए पोस्टरों ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। इन पोस्टरों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की तस्वीर दिखाई दे रही है, जिसके बाद उनके राजनीति में प्रवेश को लेकर चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं।

हालांकि निशांत कुमार की सियासी पारी को लेकर बीते कई महीनों से कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन अब जिस तरह से पार्टी मुख्यालय के अलावा पटना के विभिन्न चौक-चौराहों और यहां तक कि मुख्यमंत्री आवास के एंट्री प्वाइंट पर भी पोस्टर लगाए गए हैं, उससे संकेत मिल रहा है कि इस चर्चा को अब औपचारिक रूप दिए जाने की तैयारी हो चुकी है। जेडीयू के कई नेता और प्रवक्ता भी अब खुले तौर पर यह कहने लगे हैं कि निशांत कुमार को राजनीति में आना चाहिए।

सूत्रों का दावा: जेडीयू ने कर ली है तैयारी

बिहार की राजनीति और जेडीयू के सियासी इतिहास पर नजर डालें तो यह साफ होता है कि पार्टी के प्रवक्ता आमतौर पर वही बयान देते हैं, जो पार्टी नेतृत्व की सोच को दर्शाता है। एबीपी न्यूज़ के सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके रणनीतिकार निशांत कुमार को पार्टी में लाने की तैयारी कर चुके हैं। गौरतलब है कि जेडीयू ने 13 दिसंबर से सदस्यता अभियान भी शुरू किया है, जिसे इस दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

निशांत कुमार को क्या मिलेगी जिम्मेदारी?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर निशांत कुमार राजनीति में कदम रखते हैं तो उन्हें कौन-सी भूमिका सौंपी जाएगी। क्या नीतीश कुमार पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़कर बेटे को यह जिम्मेदारी सौंपेंगे? क्या निशांत को मंत्री बनाकर सरकार में शामिल किया जाएगा? या फिर पार्टी नेताओं की मांग के अनुसार उन्हें सीधे मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी जा सकती है? इन सवालों के जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं।

नीतीश कुमार अब तक परिवारवादी राजनीति के मुखर विरोधी रहे हैं। हालांकि जेडीयू में उनके बाद नेतृत्व को लेकर जो खालीपन पैदा हुआ है, उसे देखते हुए पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि निशांत कुमार को उत्तराधिकारी के तौर पर आगे लाया जाना चाहिए। पार्टी अध्यक्ष या कार्यकारी अध्यक्ष बनना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन मंत्री या मुख्यमंत्री बनाए जाने की स्थिति में राजनीतिक शुचिता को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।

बीजेपी की रणनीति क्या है?

सूत्रों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व भी चाहता है कि निशांत कुमार जल्द राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाएं। इसकी वजह जेडीयू की मौजूदा ताकत से जुड़ी है। बिहार में जेडीयू के 85 विधायक, विधान परिषद में 20 सदस्य, लोकसभा में 12 और राज्यसभा में 4 सांसद हैं। इसके अलावा करीब 15-16 फीसदी ऐसा वोट बैंक है, जिस पर पिछले दो दशकों से नीतीश कुमार की मजबूत पकड़ रही है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार के सक्रिय न रहने की स्थिति में यह पूरा वोट बैंक स्वतः बीजेपी में शिफ्ट हो जाए, इसकी संभावना कम है। ऐसे में अगर नीतीश की राजनीतिक विरासत बेटे निशांत कुमार को मिलती है तो महिला वोटर और अति पिछड़ा वर्ग भावनात्मक रूप से उनके साथ जुड़ा रह सकता है। वहीं, निशांत के राजनीति में न आने और जेडीयू के कमजोर पड़ने की स्थिति में इस वोट बैंक के आरजेडी या प्रशांत किशोर की ओर शिफ्ट होने की आशंका भी जताई जा रही है।

कुल मिलाकर, जेडीयू को बचाए रखने और बिहार की आगे की राजनीति तय करने के लिए नीतीश कुमार और बीजेपी—दोनों के लिए निशांत कुमार की सियासी एंट्री बेहद अहम मानी जा रही है।

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