उफ़क साहिल
भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 91.96 के स्तर तक फिसल गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। वैश्विक बाजारों में डॉलर की लगातार मजबूती, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की निरंतर बिकवाली ने रुपये पर भारी दबाव बना दिया है। इस गिरावट के साथ ही भारतीय रुपया एशियाई मुद्राओं में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है।
मुद्रा विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने की संभावनाओं ने उभरते बाजारों की मुद्राओं को कमजोर किया है। इसके अलावा भारत के व्यापार घाटे में बढ़ोतरी और आयात में इजाफा भी रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह बन रहा है। आयातकों की ओर से डॉलर की बढ़ती मांग ने विदेशी मुद्रा बाजार में असंतुलन और बढ़ा दिया है।
वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, कमजोर एशियाई बाजार संकेत और जोखिम से बचने की निवेशकों की प्रवृत्ति ने भी रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाला है। हालांकि भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा बाजार में संभावित हस्तक्षेप की उम्मीदें बनी हुई हैं, लेकिन फिलहाल रुपये को कोई ठोस सहारा मिलता नजर नहीं आ रहा है।
विश्लेषकों के मुताबिक, आने वाले दिनों में अमेरिका के महंगाई और रोजगार से जुड़े अहम आर्थिक आंकड़े, साथ ही अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, रुपये की चाल तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। यदि वैश्विक हालात में सुधार नहीं होता है, तो रुपये पर दबाव और गहराने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
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