अदनान आलम
पटना: बिहार में गरीबी को लेकर सामने आए ताज़ा जिला-वार आंकड़ों ने राज्य की सामाजिक-आर्थिक हकीकत को एक बार फिर उजागर कर दिया है। नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी रिपोर्ट (2015-16 से 2019-20) के आधार पर तैयार आंकड़ों के मुताबिक, सीमांचल और कोसी क्षेत्र के जिले अब भी सबसे अधिक गरीबी से जूझ रहे हैं, जबकि कुछ जिलों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर देखने को मिली है।
अररिया, पूर्णिया और सुपौल सबसे गरीब जिलों में शामिल
आंकड़ों के अनुसार, अररिया बिहार का सबसे गरीब जिला है, जहां करीब 64.64 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के दायरे में आती है। इसके बाद पूर्णिया (63.97%), सुपौल (63.85%), सहरसा (63.46%) और मधुबनी (61.97%) का स्थान है। ये सभी जिले सीमांचल और कोसी क्षेत्र से जुड़े हैं, जहां लंबे समय से आर्थिक पिछड़ापन, बाढ़ और सीमित संसाधन बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
सिवान, मुंगेर और रोहतास सबसे अमीर जिलों में
वहीं, राज्य के अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले जिलों की बात करें तो सिवान में सबसे कम गरीबी दर्ज की गई है, जहां यह आंकड़ा 42.22 प्रतिशत है। इसके अलावा मुंगेर, रोहतास, पटना और गोपालगंज भी पांच सबसे कम गरीबी वाले जिलों में शामिल हैं। राजधानी पटना का प्रदर्शन ग्रामीण जिलों की तुलना में बेहतर रहा है।
पूर्वी चंपारण में सबसे तेज गिरावट
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि पूर्वी चंपारण में गरीबी घटने की रफ्तार सबसे तेज रही है। इसके बाद शिवहर का स्थान आता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी योजनाओं, बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों का असर कुछ जिलों में स्पष्ट रूप से दिख रहा है।
बहुआयामी गरीबी के 12 पैमाने
नीति आयोग की यह रिपोर्ट केवल आय तक सीमित नहीं है, बल्कि गरीबी को 12 अलग-अलग संकेतकों के आधार पर मापती है। इनमें आय-व्यय, गरीबी रेखा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, सामाजिक सुरक्षा, पोषण, स्वच्छता और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं।
क्षेत्रीय असमानता बनी बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में गरीबी की सबसे बड़ी समस्या क्षेत्रीय असमानता है। सीमांचल और कोसी क्षेत्र में विकास की रफ्तार अब भी धीमी है, जबकि कुछ शहरी और मध्य बिहार के जिलों में हालात सुधर रहे हैं। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विकास का लाभ सभी क्षेत्रों तक समान रूप से पहुंचे।
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