बिहार की राजनीति एक बार फिर सोशल मीडिया पर तीखी और अमर्यादित भाषा के कारण चर्चा में है। हाल ही में एक राजनीतिक बयान और उसके जवाब में सत्ताधारी दल की प्रतिक्रिया ने राजनीतिक संवाद के स्तर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। “जिंदा लाश” और “9वीं फेल लुटेरा” जैसे शब्दों का इस्तेमाल दर्शाता है कि वैचारिक बहस की जगह अब व्यक्तिगत हमले और अपमानजनक टिप्पणियाँ ले रही हैं।
राजनीति में असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब बहस मुद्दों से हटकर परिवार, निजी जीवन और अपमान तक पहुंच जाती है, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को क्षति होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की भाषा जनता में राजनीतिक विमुखता (political alienation) बढ़ाती है और युवाओं के बीच राजनीति की छवि को नकारात्मक बनाती है।
सोशल मीडिया ने राजनीतिक दलों को सीधा संवाद का मंच दिया है, परंतु इसी मंच का उपयोग जब ट्रोलिंग और कटाक्ष के लिए होता है, तो यह जनचर्चा को विषाक्त बना देता है। खासकर बिहार जैसे राज्य में, जहां विकास, रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे गंभीर मुद्दे प्रमुख हैं, वहां राजनीतिक विमर्श का स्तर गिरना चिंता का विषय है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चुनावी रणनीति के तहत उग्र भाषा का प्रयोग समर्थकों को उत्साहित करने के लिए किया जाता है, लेकिन दीर्घकाल में यह लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। लोकतंत्र में विचारों का टकराव होना चाहिए, व्यक्तित्व का नहीं।
आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दल आचार संहिता का पालन करें, सोशल मीडिया टीमों को संयमित भाषा का प्रशिक्षण दें और मुद्दा-आधारित राजनीति को बढ़ावा दें। क्योंकि राजनीति का स्तर ही लोकतंत्र की गुणवत्ता तय करता है।
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Shaina jamil
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