✍️ रेहान फ़ज़ल

भारत में नागरिकता छोड़ने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और यह जानकारी किसी निजी संस्था या अनुमान पर नहीं, बल्कि भारत सरकार के विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs – MEA) द्वारा संसद में दिए गए लिखित उत्तर पर आधारित है। सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि पिछले कुछ वर्षों में लाखों भारतीयों ने भारतीय नागरिकता त्यागकर विदेशी नागरिकता अपनाई है, जो देश के लिए एक गंभीर और सोचने वाला मुद्दा बनता जा रहा है।

विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में करीब 9 लाख भारतीयों ने भारतीय नागरिकता छोड़ी। वहीं अगर 2011 से 2024 की अवधि को देखा जाए तो यह संख्या करीब 21 लाख तक पहुंच चुकी है। कोरोना काल के दौरान वर्ष 2020 में यह आंकड़ा घटकर लगभग 85 हजार रहा, लेकिन 2021 के बाद इसमें तेज बढ़ोतरी देखी गई और अब हर साल लगभग 2 लाख लोग नागरिकता छोड़ रहे हैं।

इन आंकड़ों के सामने आने के बाद यह सवाल आम जनता के मन में उठता है कि आखिर लोग अपना जन्म देश छोड़ने का इतना बड़ा फैसला क्यों ले रहे हैं। बेहतर नौकरी, ज्यादा आमदनी, अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और सुरक्षित भविष्य की तलाश इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं। कई लोग यह भी मानते हैं कि विदेशों में मेहनत का सही सम्मान मिलता है और सिस्टम ज्यादा भरोसेमंद है।

सरकार से यह पूछना जरूरी हो जाता है कि देश में युवाओं के लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर क्यों नहीं बन पा रहे हैं। क्या शिक्षा और रिसर्च के क्षेत्र में मौके सीमित हो गए हैं? क्या महंगाई, टैक्स का बोझ और जीवन की अनिश्चितता लोगों को देश छोड़ने पर मजबूर कर रही है? और सबसे अहम सवाल यह है कि सरकार प्रतिभाशाली और मेहनती नागरिकों को देश में रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठा रही है?

इस बढ़ते रुझान से भारत को बड़ा नुकसान हो रहा है। पढ़े-लिखे और कुशल लोग जब देश छोड़ते हैं तो इसे आम भाषा में दिमागी पलायन कहा जाता है। इससे देश की अर्थव्यवस्था, विकास और नई सोच पर असर पड़ता है। सरकार और समाज जिन लोगों की शिक्षा और प्रशिक्षण पर खर्च करते हैं, उसका लाभ दूसरे देशों को मिल जाता है।

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