सबा फिरदौस
अयोध्या की पवित्र धरती पर सरयू नदी के तट से जुड़ी एक ऐसी कहानी है, जो धर्म, जाति और मजहब की सीमाओं को तोड़कर इंसानियत का सबसे बड़ा सबक सिखाती है। इस कहानी के नायक हैं मोहम्मद शरीफ, जिन्हें लोग प्यार से शरीफ चाचा कहते हैं और पहचान देते हैं लावारिस लाशों के मसीहा के रूप में।
करीब 28 वर्षों में शरीफ चाचा ने 25 हजार से अधिक लावारिस शवों का उनके धर्म के अनुसार विधि-विधान से अंतिम संस्कार कराया। यह काम न किसी सरकारी आदेश पर हुआ, न किसी संस्थागत सहयोग से बल्कि एक पिता के टूटे हुए दिल से निकली कसम ने उन्हें इस रास्ते पर ला खड़ा किया।
दर्द से जन्मी सेवा की राह
करीब तीन दशक पहले सुल्तानपुर में शरीफ चाचा के बेटे की हत्या कर दी गई। बेटे के शव को लावारिस समझकर नदी में प्रवाहित कर दिया गया। इस अमानवीय अनुभव ने शरीफ चाचा को अंदर से झकझोर दिया। उसी दिन उन्होंने संकल्प लिया कि अयोध्या और फैजाबाद में कोई भी इंसान चाहे हिंदू हो या मुसलमान लावारिस नहीं मरेगा। हर शव को सम्मान के साथ अंतिम विदाई मिलेगी।
साइकिल मिस्त्री से समाजसेवी तक
खिड़की अली बेग मोहल्ले में रहने वाले मोहम्मद शरीफ कभी साइकिल मिस्त्री थे। साधारण जीवन, सीमित आमदनी, लेकिन असाधारण सोच। धीरे-धीरे उनका जीवन सरयू घाट पर मिलने वाली लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के इर्द-गिर्द सिमट गया। न उन्होंने कभी जाति पूछी, न धर्म जो पहचान मिली, उसी के अनुसार अंतिम संस्कार कराया। कहीं चिता जली, कहीं जनाज़ा पढ़ा गया।
निजी दुख, लेकिन अडिग हौसला
शरीफ चाचा के चार बेटे थे। एक बेटे की हत्या हो गई, दूसरे की हृदयगति रुकने से मौत हो गई। अब उनके दो बेटे मोहम्मद सगीर और मोहम्मद जमील ही उनका सहारा हैं। खराब स्वास्थ्य के बावजूद शरीफ चाचा की सेवा की लौ बुझी नहीं है। उनके बेटे और स्थानीय लोग आर्थिक सहयोग से इस नेक काम को आगे बढ़ा रहे हैं।
पद्मश्री से मिला राष्ट्रीय सम्मान
इंसानियत की इस बेमिसाल सेवा को देश ने भी सलाम किया। वर्ष 2021 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मोहम्मद शरीफ को पद्मश्री सम्मान से नवाजा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई गणमान्य लोगों ने उनके कार्य की सराहना करते हुए कहा कि यह सेवा समाज के लिए एक मिसाल है।
आने वाली पीढ़ी के लिए संदेश
85 वर्षीय शरीफ चाचा आज भी यही संदेश देते हैं—मां-बाप की इज्जत करो और समाज की सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाओ। उनका जीवन बताता है कि बड़ा काम करने के लिए बड़े साधनों की नहीं, बल्कि बड़े दिल की जरूरत होती है।
अयोध्या की गलियों से लेकर देश के सर्वोच्च सम्मानों तक का यह सफर साबित करता है कि जब इंसानियत जिंदा हो, तो कोई भी लाश लावारिस नहीं होती। मोहम्मद शरीफ चाचा सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि करुणा, संवेदना और मानवता की जीवित पहचान हैं।
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